1. नदी (बाल कविता)
नदी (बाल कविता)
कभी न उसको रुकना आए
कल-कल करती बहती जाए
राह में पर्वत हो या मैदान
रुकता नहीं उसका अभियान
वर्षा धरती का मुख धुलाए
नदी नीर बहा ले जाए
जब जब बरसे जल विशाल
तब तब धरे ये रूप विकराल
गर्मी से जब धरा है सूखती
नदी उसमें प्राण है फूंकती
अतिक्रमण उसे नहीं सुहाता
स्वच्छन्द बहना है बस आता
कुदरत धरती को खूब सजाती
नदियों की माला है पहनाती
मानवता का होगा उत्थान
प्रकृति का जब होगा सम्मान
जीना है तो नदी बन कर बहना
रुकना नहीं बस चलते रहना
― भगत राम मंडोत्रा
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