Posts

33. पृथ्वी दिवस (बाल कविता)

  33.   पृथ्वी दिवस (बाल कविता) बाईस अप्रैल को हर वर्ष, पृथ्वी  दिवस  मनाते  हैं। पर्यावरण बचाने के लिए, सभी देश कसमें खाते हैं। ताकि  ग्रह  के लिए घातक, मानव गतिविधियां कम हों। पर्यावरण     बचाने     हेतु, समस्त  प्रयासों  में  दम हो। ग्लोबल वार्मिंग की बजह से, धरती  का  पारा  चढ़   रहा। विषैली   गैसों    के   कारण, जीवन  को  खतरा  बढ़ रहा। ग्रीन  हाउस  गैसों  में  बढ़त, पॉलीथिन  बन  गई सिरदर्द। तबाही  का   तांडव   रचेगा, एक दिन ये खतरनाक मर्ज। मौसम चक्र अनियमित हो गया, गर्मी   लंबी   होती   जा   रहीं। सर्द रितु की अवधि  और  ठंड, पृथ्वी  पहले  से  कम  पा रही। आओ आज मिल कर प्रण करें, हम    प्रदूषण    दूर   भगाएंगे। धरा   को   अपने  प्रयासों   से,  रहने    के    लायक   बनाएंगे। — भगत राम मंडोत्रा

32. चावल (बाल कविता)

  32.   चावल (बाल कविता) हम सभी बड़े चाव से चावल  खाते  हैं, आओ जानें कैसे वे थाली तक आते हैं। कार्बोहाइड्रेट    की    खान    हैं   चावल, सरल सुपाच्य अनाजों की शान हैं चावल। पहले किसान करते धान की बुआई, फिर  तैयार पौध की होती है रोपाई। खरीफ  की  फसलों में से एक है धान, चाहिए प्रचुर जल और उच्च तापमान। चंद महीनों  में  फसलें लहलहाती हैं, पौधों पर धान की बालियां आती हैं। जब  बालियों  के  पक  जाते  पूरे दाने, कृषक को अलग करने पड़ते हैं कराने। धान  कुट्टी  में   धान   डाले  हैं  जाते, अलग होकर भूसी चावल बाहर आते। चावलों  के  होते  हैं  कई  प्रकार   आकार, जो बनाते हैं सब के लिए सन्तुलित आहार। बासमती  चावल  की  होती  सुगंध सुहानी, अन्य किस्मों की भी अपनी-अपनी कहानी। जो चावल  जितना  हो जाता है पुराना, उतना ही बढिया उससे बनता है खाना। — भगत राम मंडोत्रा

31. सौरमंडल (बाल कविता)

  31.  सौरमंडल (बाल कविता) सौर मंडल के बारे में  बैज्ञानिक  कहते  हैं, वहां खगोलीय पिंड आपस में बंधे रहते हैं। गुरुत्वाकर्षण  उनमें   एक   दूरी   बनाता   है,  और अपने-अपने परिक्रमा पथ पर घुमाता है। उन पिंडों में ग्रह, उपग्रह और धूमकेतु संग, क्षुद्रग्रह और उल्कापिंड भी हैं दिखाते  रंग। सौरमंडल के मध्य में सबसे बड़ा  एक  तारा, असीम ऊर्जा का स्त्रोत  है वह सूरज हमारा। ये  सभी पिंड  सूर्य  के  गिर्द  चक्कर  लगाते  हैं, और सभी साथ मिल कर सौर मंडल कहलाते हैं। कुल मिलाकर सौरमंडल में आठ ग्रह हैं  खास, सबसे छोटा  'बुध' है उनमें सूर्य के सबसे पास। दूसरे नंबर पर 'शुक्र' ग्रह की आती  है  बारी, जिसकी चमक और सुंदरता है सबसे न्यारी। हमारा 'पृथ्वी' ग्रह तीसरे नंबर पर है आता,  ग्रहों में केवल इसमें  है जीवन पाया जाता।  क्रम मे चौथे नंबर पर मंगल  ग्रह  है  आता, जिसका पृथ्वी से मिलता-जुलता है खाका। फिर क्रमशः बृहस्पति,शनि,अरुण, वरुण है आते, सौरमंडल ...

30. फसलों के प्रकार (बाल कविता)

  30.   फसलों के प्रकार (बाल कविता) आदिकाल में मानव कन्द-मूल खाता था, पेड़  पौधों  से  अपना  भोजन पाता था। धरती  पर  ज्यों-ज्यों  मानव का विकास हुआ, भोजन की क़िल्लत का उसको आभास हुआ। आवश्यकता ने दिया जन्म अविष्कार को, कृषि करना सीखी उसने निज उद्धार को। धरती खोद कर बीज रोपण करने लगा, उगा कर फसलें पेट अपना भरने लगा। हम भारतीय जिस  भूभाग  में  आते  हैं, वहां ऋतु अनुसार फसलें तीन उगाते हैं। मई से जुलाई तक जो  हैं  बीजी  जातीं, वे बरसाती फसलें 'खरीफ' हैं कहलातीं। धान,मक्का,बाजरा 'खरीफ' में हैं आते, सितंबर-अक्टूबर  में  वो काटे हैं जाते। अक्टूबर - दिसंबर  में  जो  हैं  बोई  जातीं। शीत काल की वे फसलें 'रबी' हैं कहलातीं। गेहूं, चना, सरसों, आलू इसमें हैं आते, जो फरवरी-अप्रैल में निकाले हैं जाते। जो रबी व खरीफ के बीच उगाई जातीं, वे फसलें  'जायद'  फसलें हैं कहलातीं।  'जायद' फसलों में शामिल सब्जियां ज्यादा, किसानों  को  जिनसे  होता  खूब  फायदा। — भ...

29. स्वास्थ्य (बाल कविता)

  29.   स्वास्थ्य (बाल कविता) स्वस्थ तन  में  है बसता स्वस्थ मन, स्वास्थ्य होता है एक अनमोल धन। स्वास्थ्य हो तो खुशियों का अर्थ है, बगैर स्वास्थ्य के सब कुछ व्यर्थ है। खो कर सहज नहीं होता पाना, रूठे  तो  मुश्किल  इसे मनाना। नींव  पर  टिकती  इमारत सारी, स्वस्थ बालपन का महत्व भारी। फास्ट फूड व कोल्ड ड्रिंक सियापा, ज़रा  सा  स्वाद  दे  विकट मोटापा। निज खान-पान  को  तुरंत सुधारो, स्वाद के लिए न स्वास्थ्य बिगाड़ो। खेलो - कूदो,   कसरत,  योग  करो,  शुद्ध, सात्विक व पौष्टिक भोग करो। — भगत राम मंडोत्रा

28. सफलता की कूंजी (बाल कविता)

सफलता की कूंजी (बाल कविता) आसान  भला  कोई  काम  नहीं होता, काम किए बिना कभी नाम नहीं होता। जो आज है करना उसे अभी है  करना, और कल का भरोसा न कभी है करना। पहले अपने  बड़ों  से  उसकी  बात  करो, फिर आज ही नए काम की शुरुआत करो। चैन  से  रात  को  गहरी  नींद  है सोता, जो आज का काम कल तक नहीं ढोता। जो भी है करना मन लगा कर करना, उसे हर हालत में  फिर पूरा है करना। मेहनत व लग्न जहां भरपूर हैं होतीं, मंजिलें  वहां  से  नहीं  दूर  हैं होतीं। बस परिश्रम ही है सफलता की कूंजी, और सफलता है जीवन भर की पूंजी। — भगत राम मंडोत्रा

27. चिड़िया (बाल कविता)

Image
  27.  चिड़िया (बाल कविता) सुबह-सबेरे  शीघ्र  उठ  जाती चिड़िया। अपने काम में फिर जुट जाती चिड़िया। चूं-चूं  चीं-चीं  की  मधुर  धुन  सुनाकर, सुबह जगने वालों को रिझाती चिड़िया। दूर-दूर  जाकर  दाना-दुनका  चुनती, खुद मेहनत करके है खाती चिड़िया। तिनका-तिनका लाकर अपनी चोंच से, घोंसला सुंदर सा फिर बनाती चिड़िया। निज नीड़ को सजा कर नन्हे अंडों से, अपने साथी संग घर बसाती चिड़िया। अंडों  से  बच्चे  जब  बाहर   हैं   आते,  प्यार से चुगा ला कर खिलाती चिड़िया। नन्हों  के  जब पंख निकल हैं आते,  अभ्यास उड़ने का कराती चिड़िया। जब - जब   कोई   संकट   सामने  आए, निड़र हो कर उससे भिड़ जाती चिड़िया।        — भगत राम मंडोत्रा