7. परिवर्तन (बाल कविता)



 7.   परिवर्तन (बाल रचना)


कभी ज्यादा तो कभी कम है

परिवर्तन प्रकृति का नियम है


समय संग सब कुछ है बहता

एक  सा  कुछ भी नहीं रहता


सोचो  जो  न मौसम बदलता

कितना ये हम सबको खलता


सर्दी  में गर्मी  की  आस  है

फिर आ धमकती बरसात है


अंकुर  पौधे  बन  जाते हैं

पेड़ों पर फल उग आते हैं


जड़ - चेतन  बच  नहीं पाते

सब इसके आगे सिर झुकाते


अगर परिवर्तन  नहीं होता

जीवन कितना नीरस होता


― भगत राम मंडोत्रा








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