23. कुदरत की लीला (बाल कविता)

 23.   कुदरत की लीला (बाल कविता)


          कुदरत की अजब-गजब लीला है

          धरती  हरी   आकाश   नीला   है


कहीं  सूरज कहीं चांद है खिलता

हर जगह एक सा, नहीं है मिलता


          मोटे  पतले  कहीं  लंबे  छोटे

          सभी जीव  नहीं एक से  होते


शक्तिशाली सुखमय जीवन जीता

निर्बल   निर्धन   है   रहता   रीता


          कहीं अति जल है तो कहीं थल है

          हरे  खेत  कहीं  तप्त  मरुस्थल है


हर  कोई  अगर एक सा होता

नज़ारा सोचो  तब  कैसा होता


          ― भगत राम मंडोत्रा

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