25. प्यार करो (बाल कविता)

 25.   प्यार करो (बाल कविता)


बड़ों का हमेशा सत्कार करो

और छोटों से तुम दुलार करो


             जो  खुद  को  नापसंद हो बैसा

             कभी किसी से न व्यवहार करो


भूल अगर  कभी हो जाए तो

भूल कर भी न बार-बार करो


              हर हाल में निभा कर दिखाओ

              कभी जब किसी से करार करो 


समाज जंग  का  मैदान  नहीं

पहले किसी पर न प्रहार करो


              तथ्यों का  जो  ज्ञान  न हो तो  

              बहस कभी न तुम बेकार करो


जिनसे  घाव  गहरे  होते  हैं

कुंद उन बोलों की धार करो


              बैर किसी  से  न  करना  भाई

              हो सके तो तुम बस प्यार करो


              — भगत राम मंडोत्रा

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